Sunday, July 28, 2019

Sanskrit'a Brahmi word 3

Friday, July 26, 2019

English- sanskrit sentences


 *English- sanskrit sentences*
 *आंग्ल संस्कृत वाक्य*
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Seeta plays.
'Seeta kreedati
( सीता क्रीडति )'

you play.
 'tvam kreedasi .(त्वं क्रीडसि )'

I play.
' aham kreedaami
(अहं क्रीडामि )'



Alex says. '
Alexha vadati
( अलेक्षः वदति )'

You say.
'tvam vadasi
(त्वं वदसि )'

I say. '
aham vadaami
(अहं वदामि )'



This person (referring to he) sits.
 'eshaha upavishati
(एषः उपविशति)'

You sit.
'tvam upavishasi
(त्वम् उपविशसि )'

I sit.
'aham upavishaami
(अहम् उपविशामि )'

Tuesday, July 23, 2019

मोऽनुस्वारः

पदाच्या शेवटी 'म् ' असेल व पुढे स्वर असेल तो अन्त्य 'म्' तसाच ठेवावा. किंवा तो पुढील स्वरात मिळवून त्यांचे पूर्ण अक्षर करावे जसे-(१)अहम् अस्मिता। किंवा अहमस्मि। (२) त्वम् उर्वशी। किंवा त्ममुर्वशी।
पदान्ती 'म्' असून पुढे व्यंजन आल्यास 'म्'बद्दल त्यामागील अक्षरावर अनुस्वार लिहावा. जसे (१) त्वं शङ्कर:।( २) त्वं यमुना।
वाक्याच्या शेवटीच्या पदान्ती 'म्' असेल तर तो तसाच ठेवावा. जसे (१) गजानन: अहम्।( २) सुरेश: त्वम्। 🙏🏽🙏🏽🙏🏽

तुम् प्रत्ययान्त हेत्वर्थक रूप


                      क्रियापद 

                      ******
  [ ' तुम ' प्रत्ययान्त हेत्वर्थक रूप ]
१, गन्तुम् = जाने के लिये
२, पातुम् = पीने के लिये ।
३, पठितुम् = पढ़ने के लिये ।
४, द्रष्टुम् = देखने के लिये ।
५, क्रीडितुम् = खेलने के लिये ।
६, वक्तुम् = बोलने के लिये ।
७, धावितुम् = दौड़ने के लिये ।
८, पतितुम् = गिरने को लिये ।
९, आगन्तुम् = आने के लिये ।
१०, लिखितुम् = लिखने के लिये ।
११, स्थातुम् = ठहरने के लिये ।
१२,  भक्षयितुम् = खाने के लिये ।
१३,  कर्तुम् = करने के लिये ।
१४,  भवितुम् = होने के लिये ।
१५, अर्चितुम् = पूजने के लिये ।
१६, खेलितुम् = खेलने के लिये ।
१७, चलितुम् = चलने के लिये ।
१८, धारयितुम् = धारण करने के लिये ।
१९, कथयितुम् = कहने के लिये ।
२०, क्षालयितुम् = धोने के लिये
२१, पालयितुम् = पालन करने के लिये ।
२२,  तुलयितुम् = तोलने के लिये ।
निम्नांकित वाक्यों का हिन्दी मे अनुवाद कीजिए :---
१,  अहं तत्र स्थातुं गच्छामि ।
२, दुग्धं पातुं कः न इच्छति ?
३, सः पठितुं शालां गच्छति
४,  उद्यानं द्रष्टुं सः तत्र गमिष्यति ।
५, किं त्वं क्रीडितुं न आगमिष्यसि ?
६, स सभायां वक्तुं गमिष्यति ।
७, अश्वः धावितुम् सज्जः ।
८, पतितुं कः इच्छति ?
९,किं सः अत्र आगन्तुं इच्छति?
१०, अहं पत्रं लिखितुं इच्छामि ।
११, सः तत्र स्थातुं न शक्तः ।
१२, मोदकान् भक्षयितुं तत्र गच्छामि ।
१३, त्वं किं कर्तुं इच्छसि ?
१४, सः नृपतिः भवितुं योग्यः ।
१५, कः शुकं पालयितुं इच्छति?
             क्रियापद
         अट् = भटकना
अटति = भटकता है ।
अटन्ति = भटकते हैं ।
अटसि = भटकता हैं ।
अटथ = भटकते हैं ।
अटामि = भटकता हूँ ।
अटामः = भटकते हैं ।
अटिष्यति = भटकेगा ।
अटिष्यन्ति = भटकेंगे ।
अटिष्यसि = भटकेगा ।
अटिष्यथ = भटकोगे ।
अटिष्य़ामि = भटकूँगा ।
अटिष्यामः = भटकेंगे ।
            अर्च = पूजना
अर्चति = पूजता हैं ।
अर्चन्ति = पूजते हैं ।
अर्चसि = पूजता हैं ।
अर्चथ = पूजते हैं ।
अर्चामि = पूजता हूँ ।
अर्चामः = पूजते हैं ।
अर्चिष्यति = पूजेगा ।
अर्चिष्यथ = पूजोगे ।
अर्चिष्यसि = पूजेगा ।
अर्चिष्यामः = पूजेंगे ।
अर्चिष्यामि = पूजूँगा ।
अर्चिष्यन्ति = पूजेंगे ।
           खेल् = खेलना
खेलति = खेलता हैं ।
खेलन्ति = खेलते हैं ।
खेलसि = खेलता हूँ ।
खेलथ = खेलते हैं ।
खेलामि = खेलता हूँ ।
खेलामः = खेलतें हैं ।
खेलिष्यति = खेलेगा ।
खेलिष्यन्ति = खेलेंगे ।
खेलिष्यसि = खेलेगा ।
खेलिष्यन्ति = खेलेंगे ।
खेलिष्यसि = खेलेगा ।
खेलिष्यथ = खेलोगे ।
खेलिष्यामि = खेलूँगा ।
खेलिष्यामः = खेलेंगे ।
             चल् = चलना
चलति = चलता है ।
चलन्ति = चलतें है ।
चलसि = चलता हैं ।
चलथ = चलते हो ।
चलामि = चलता हूँ ।
चलामः = चलते हैं ।
चलिष्यति = चलेगा ।
चलिष्यन्ति = चलेंगे ।
चलिष्यसि = चलेगा ।
चलिष्यथ = चलोगे ।
चलिष्यामि = चलूँगा ।
चलिष्यामः = चलेंगे ।
संस्कृत में अनुवाद कीजिए :--
१, वहाँ बालक पूजा करते हैं ।
२, आलसी आदमी शीघ्र नही चलता ।
३, आलसी लड़का खेल के मैदान  में नही खेलता ।
४, क्या तू उस विद्यालय में खेलेंगा ।
५,बसन्त वहाँ पर अवश्य खेलेंगा ।
६,वे छात्र प्रतिदिन वहाँ खेलते हैं ।
७, क्या वह बालक उस उद्यान
में भटकता हैं ?
८, यदि तू प्रातःकाल घूमेंगा तो
निरोग हो जायेगा ।
९, बगीचें में फूल होते हैं ।
१०, तालाब में कमल होते हैं ।
११, वृक्ष पर फल होते हैं ।
१२, क्या वहाँ छात्र नही होंगे ?
१३, यदि वहाँ छात्र होंगे तो मैं उनके साथ खेलूँगा ।
१४, क्या तू मेरे साथ भोजन करेंगा ?
१५, मैं तो आज भोजन नहीं करूँगा ।
१६, घोड़े शीघ्र दौड़ते हैं ।
१७, स्वस्थ मनुष्य तेज चलते हैं
१८, वह अस्वस्थ बालक कैसे शीघ्र चलेगा ?
१९, क्या तू प्रातःकाल देव की पूजा नहीं करेगा  ?
२०, हम तो देव की सायंकाल मन्दिर में प्रतिदिन पूजते हैं ।
२१, तुम सब परमेश्वर को क्यों
नहीं पूजते ?
२२, क्या तुम कल परमेश्वर को अवश्य पूजोगे ?
                 **
                शब्द
१, बलीवर्दः, वृषभः = बैल ।
२, कृषकः, कृषीवलः = किसान
३, सस्यम्, धान्यम्, = अन्न ।
४, तृणम् = घास ।
५, क्षेत्रम् = खेत ।
६, कृषकः = हल चलाने वाला ।
७, हलम् = हल ।
८, बीजम् = बीज
९, वर्षाकालः = बरसात का
                             समय ।
१०, आलवालम् = थांबला ।
११, मेघः बादल ।
१२, स्वापः = नींद ।
१३, दीपः = दीया ।
१४, गुडः = गुड़ ।
१५, खेटः, खेटकः = गाँव (खेडा
१६, क्रयणम्, क्रयः = खरीदी ।
१७, विक्रयः = बिक्री ।
१८, आपणः = दुकान ।
१९, हट्टः = बाजार ।
२०,आपणिकः = दुकानदार ।
२१, गोष्ठीगृहम् = चौपाल (क्लब
                 **
      

वेदाङ्गानि


वेदाङ्ग


वेद के ६ अंग हैं== शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष और कल्प।


१. शिक्षा ~~  इसमें वेद का शुद्ध पाठ करने के लिये ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, उदात्त, अनुदात्त, समाहार, स्वरित्,अनुनासिक आदि भेद से शिक्षा दी गई है, क्योंकि उच्चारणज्ञान के न होने से अनर्थ की प्राप्ति होती है। सर्ववेदों के लिए साधारण शिक्षा को श्री पाणिनी मुनि ने "अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि" इत्यादि से आरंम्भ करके नौ खंडों में प्रकाशित किया है और प्रत्येक वेद के लिए भिन्न-भिन्न शिक्षायें 'प्रातिशाख्य' नाम से अन्यान्य ऋषियों ने बनाई है।

२. व्याकरण ~~  वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये, व्याकरण का मुख्य प्रयोजन है। प्राचीन काल में आठ प्रकार के व्याकरण थे। इनका पाणिनि ऋषि ने सारांश अपने अष्टाध्यायी व्याकरण में दिया है। इसके आरम्भ में भगवान् शङ्कर के डमरू से निकले १४ सूत्रों का वर्णन है। अष्टाध्यायी के सूत्रों पर कात्यायन ऋषि का वार्तिक है तथा पतञ्जलि ऋषि का महाभाष्य है। इन तीनों पर कैय्यट ऋषि ने विस्तार से टीका की है।

सूत्र, वार्तिक तथा भाष्य के लक्षण इस प्रकार से हैं~~

"अल्पाक्षरसन्दिग्धम् सारवद् विश्वतोमुखम्।
अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः।।"
जिसमें बहुत थोड़े अक्षर हों, किन्तु अर्थ सन्देह रहित हो, विश्वतोमुखी अर्थ (गागर में सागर भरा हुआ) सूत्र के विशेषज्ञों ने उसे सूत्र कहा है।

वार्तिक ~~   "उक्तानुक्त दुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते।
तं ग्रँथं वार्तिकं प्राहु: वार्तिकज्ञा: मनीषिणः।।"
मूल में कही हुई बात, न कही हुई बात तथा कठिन कही हुई बात की चिंता जहां होती है, वार्तिक के मर्म जानने वाले विद्वानों ने उसे वार्तिक कहा है।

भाष्य ~~ "सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र वाक्यै: सूत्रानुकारिभि:।
स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदोविदुः।।"
सूत्रकार के वाक्यों के अनुसार जहां अर्थ किया जाता है तथा अपने द्वारा कहे शब्दों की व्याख्या की जाती है, भाष्य के जानने वाले विद्वानों ने उसे भाष्य कहा है।

३. निरुक्त ~~  शिक्षा, व्याकरण से वर्णों का शुद्ध उच्चारण होने पर भी वैदिक मंत्रों का अर्थ जानने की इच्छा से जो ग्रन्थ रचा जाता है, उसे निरुक्त कहते हैं। भगवान् यास्काचार्य ने १३ अध्यायों में निरुक्त की रचना की है। निरुक्त दो प्रकार का है= लौकिक निरुक्त, वैदिक निरुक्त ;  दोनों रचना इन्ही की है। लौकिक निरुक्त में महाभारत, पुराण, रामायण आती है, वैदिक निरुक्त में वैदिक देवता, द्रव्यपदार्थ के पर्यायवाची शब्दों का निरूपण है, इसको वैदिक निघण्टु भी कहते हैं। यह ५ अध्यायों में है। यास्काचार्य के अतिरिक्त अमरकोष, मेदिनी कोष आदि भी निरुक्त के अंतर्गत ही आते हैं।

४. छन्द ~~ इसके कर्ता पिंगल ऋषि हैं। यह शास्त्र भी दो प्रकार का है --  लौकिक, वैदिक।
वैदिक छन्दों में गायत्री, उष्णिग्, अनुष्टुप्, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती आदि सात छन्द हैं। लौकिक छन्दों में शार्दूलविक्रीड़ित सृग्धरा, विराट् आदि अनेक छन्द हैं।

५. ज्योतिष ~~ वैदिक काल के काल ज्ञान के लिए ; गर्गाचार्यादि अनेक ऋषियों ने अनेक प्रकार से इस शास्त्र से सम्बंधित ग्रन्थ लिखें हैं।

६. कल्प ~~  शास्त्रीय गुणों के उपसंहार में वैदिक अनुष्ठान का क्रमानुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए कल्प-सूत्रों की रचना हुई है। चारों वेदों के भिन्न-भिन्न कल्पसूत्र हैं। अथर्ववेद से सम्बंधित के लिए बौधायन, आपस्तम्ब, कात्यायन आदि के सूत्र हैं तथा सामवेदी प्रयोगों के लिए लाटायन-ब्रिहियायन आदि सूत्र हैं।

 ये वेद के ६ अंग हुये। जैसे हमारे शरीर में मुख, नासिका, नेत्र, पैर, श्रोत्र आदि अंग हैं, वैसे ही व्याकरण भगवान् वेद का मुख, शिक्षा नासिका, निरुक्त चरण, छन्द श्रोत्र, कल्प हाथ, ज्योतिष नेत्र हैं।

                  ~~~~ पूज्य गुरुदेव भगवान् प्रणीत "गुरुवंश पुराण" के सत्ययुग खण्ड के प्रथम परिच्छेद के चतुर्थ अध्याय के आधार पर

Sanskrit barakhadi

बाराखडी



क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः

ख खा खि खी खु खू खे खै खो खौ खं खः

ग गा गि गी गु गू गे गै गो गौ गं गः

घ घा घि घी घु घू घे घै घो घौ घं घः

ङ ङा ङि ङी ङु ङू ङे ङै ङो ङं ङः

च चा चि ची चु चू चे चै चो चौ चं चः

छ छा छि छी छु छू छे छै छो छौ छं छः

ज जा जि जी जु जू जे जै जो जौ जं जः

झ झा झि झी झु झू झे झै झो झौ झं झः

ञ ञा ञि ञी ञु ञू ञे ञै ञो ञौ ञं ञः

ट टा टि टी टु टू टे टै टो टौ टं टः

ठ ठा ठि ठी ठु ठू ठे ठै ठो ठौ ठं ठः

ड डा डि डी डु डू डे डै डो डौ डं डः

ढ ढा ढि ढी ढु ढू ढे ढै ढो ढौ ढं ढः

ण णा णि णी णु णू णे णै णो णौ णं णः

त ता ति ती तु तू ते तै तो तौ तं तः

थ था थि थी थु थू थे थै थो थौ थं थः

द दा दि दी दु दू दे दै दो दौ दं दः

ध धा धि धी धु धू धे धै धो धौ धं धः

न ना नि नी नु नू ने नै नो नौ नं नः

प पा पि पी पु पू पे पै पो पौ पं पः

फ फा फि फी फु फू फे फै फो फौ फं फः

ब बा बि बी बु बू बे बै बो बौ बं बः

भ भा भि भी भु भू भे भै भो भौ भं भः

म मा मि मी मु मू मे मै मो मौ मं मः

य या यि यी यु यू ये यै यो यौ यं यः

र रा रि री रु रू रे रै रो रौ रं रः

ल ला लि ली लु लू ले लै लो लौ लं लः

व वा वि वी वु वू वे वै वो वौ वं वः

श शा शि शी शु शू शे शै शो शौ शं शः

ष षा षि षी षु षू षे षै षो षौ षं षः

स सा सि सी सु सू से सै सो सौ सं सः

ह हा हि ही हु हू हे है हो हौ हं हः

ळ ळा ळि ळी ळु ळू ळि ळी ळे ळै ळो ळौ ळं ळः

क्ष क्षा क्षि क्षी क्षु क्षू क्षे क्षै क्षो क्षौ क्षं क्षः

Common roots in Sanskrit

Verbal Forms Of Some Commonplace Verbal Roots धातु,

Verbal Root धातु  Meaning  Verbal Forms



1  गम्  To Go  गच्छामि गच्छावः गच्छामः

गच्छसि गच्छथः गच्छथ

गच्छति गच्छतः गच्छन्ति

2  वद्  To Say, To Speak  वदामि वदावः वदामः

वदसि वदथः वदथ

वदति वदतः वदन्ति

3  आ + गम्  To Come  आगच्छामि आगच्छावः आगच्छामः

आगच्छसि आगच्छथः आगच्छथ

आगच्छति आगच्छतः आगच्छन्ति

4  प्रति  + गम्  To Go Towards, To Go Unto प्रतिगच्छामि प्रतिगच्छावः प्रतिगच्छामः

प्रतिगच्छसि प्रतिगच्छथः प्रतिगच्छथ

प्रतिगच्छति प्रतिगच्छतः प्रतिगच्छन्ति

5  प्रति + आ + गम्  To Return  प्रत्यागच्छामि प्रत्यागच्छावः प्रत्यागच्छामः

प्रत्यागच्छसि प्रत्यागच्छथः प्रत्यागच्छथ

प्रत्यागच्छति प्रत्यागच्छतः प्रत्यागच्छन्ति

6  कृ  To Do  करोमि कुर्वः कुर्मः

करोषि कुरुथः कुरुथ

करोति कुरुतः कुर्वन्ति

7  खाद्  To Eat  खादामि खादावः खादामः

खादसि खादथः खादथ

खादति खादतः खादन्ति